Monday, 16 March 2020

डा० बी० आर० अम्बेडकर

डा० बी० आर० अम्बेडकर

बी० आर० अम्बेडकर की जीवनी -


       भारतीय संस्कृति के महान निर्माताओं में बोधिसत्व बाबा साहब बी० आर० अम्बेडकर का नाम भी सम्मान के साथ लिया जाता है। आज उनका नाम प्रत्येक गांव - गांव पहुँच रहा है। लेकिन बी० आर० अम्बेडकर के विषय में लोगो को बहुत ही कम जानकारी है। लोग केवल उनके राजनैतिक और सामाजिक कार्यो को ही जानते है। विश्व के छः महापुरुषों में उनकी गिनती की जाती है। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 ई० में इंदौर के महू छावनी में हुआ था। उनके पिता का नाम राम जी राव था। और वे  सेना में सूबेदार थे। उनके बचपन का नाम भीमराव था। और वे अपने पिता की चौदहवीं सन्तान - रत्न थे। अम्बेड गाँव से सम्बंधित होने के कारण वे अम्बेडकर कहलाये। और आज वे बी० आर० अम्बेडकर के नाम से प्रसिद्ध है।

      इस प्रकार भारतरत्न बाबा साहेब डा० बी० आर० अम्बेडकर ने भारतीय साहित्य और संस्कृति की सेवा की। चिंतन की नई दिशा प्रदान करते हुए 6 दिसम्बर 1956 ई० को इस संसार से चल बसे

बी० आर० अम्बेडकर की शिक्षा –

       जाति प्रथा और छुआ - छूत की रूढ़ियों से संघर्ष करते हुए उन्होंने भारत में बी० ए० तक की शिक्षा प्राप्त की। उनकी आगे की पढ़ाई अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी में हुई। वे एक आदर्श विद्यार्थी थे। जब तक वे विद्यार्थी रहे एक चित्त होकर अध्ययन किये। पुस्तकालय जाने वाले विद्यार्थीयों में सबसे पहले और सब के बाद में आने वाले पहले विद्यार्थी थे। पुस्तको का सारांश लिखने के लिए उन्होंने ने एक आँशुलिपि भी खोजी थी। वे बहुत ज्यादे सोचने वाले व्यक्ति थे। किसी समस्या पर विचार करते समय उसकी तह तक जाने जा प्रयास करते थे। इसलिए लंदन में कहा गया था कि "अम्बेडकर भारत के एक महान क्रन्तिकारी नेता होंगे।"  शिक्षा प्राप्त करने के बाद डा० अम्बेडकर ने बड़ौदा के महाराजा के यहाँ सेना सचिव के रूप में नौकरी की, क्योकि उन्होंने उनकी पढ़ाई में आर्थिक सहायता की थी।


बी० आर० अम्बेडकर की पुस्तके और ग्रन्थ –

भारत में अनेक प्रकार की जातियां है। और यहाँ के किसी भी कार्य में जाति सबसे पहले आती है। भारत में जितना नुकसान जाति से हुआ उतना किसी से नहीं। इसलिए बी० आर० अम्बेडकर ने सबसे पहले इसी समस्या पर विचार करके 1996 ई० में उन्होंने “भारत में जातियां, उत्पत्ति और यंत्रियता” नामक ग्रन्थ की रचना की। 1935 ई० में “जातियों का मूलोच्छेद” ग्रन्थ की रचना करके भारत ही नहीं विश्व के समाज शास्त्रियों को आश्चर्य में डाल दिया। 1946 ई० में उन्होंने चौथे वर्ण पर अपना शोध प्रबंध “शुद्र कौन थे?” लिखा। इस ग्रन्थ में अछूतों के विषय में पूर्ण विचार न होने कारण उन्होंने 1947 ई० में “अछूत कौर और कैसे” ग्रन्थ भारतीय संस्कृति को प्रदान किया। “ब्रिटिश भारत में सम्राज्यवादी वित्त का विकेंद्रिकारण” 1921 और “ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त अभ्युदय” 1925 में लिखकर भारत के प्रति अंग्रेजो के आर्थिक नीति का पर्दाफाश किया। देश और समाज की उन्नति के लिए 1920 ई० में उन्होंने “मूक नायक” साप्ताहिक पत्र चलाया। आगे चलके उन्होंने अनेक ग्रंथो की रचनाएं की


 जैसे-
लघु कृषि और उनके उपचार (1917)
रुपयो की समस्या, उसका उदभव और समाधान (1923)
बहिष्कृत भारत (1927)
जनता (1930)
संघ बनाम स्वतंत्रता (1939)
पाकिस्तान या भारत का विभाजन (1940)
श्री गांधी और उनका अछूतोद्धार (1942)
कांग्रेस और गांधी ने अछूतो के लिए क्या किया (1945)
राज्य एवं संख्यक (1947)
महाराष्ट्र एक भाषाई प्रान्त (1948)
भाषाई राज्यो पर विचार (1955)
समस्त राष्ट्र के प्रबोधन के लिए उन्होंने “प्रबुद्ध भारत” नामक मासिक भी चलाया।

बी० आर० अम्बेडकर और बौद्ध धर्म –

       बीसवीं सताब्दी के धार्मिक इतिहास में डा० बाबा साहेब बी९ आर० अम्बेडकर का श्रद्धा और सम्मान के साथ नाम लिया जाता है। वर्ण, वर्ग और जाति विहीन तथा ऊंच – नीच और छुआछूत की भावनाओं से मुक्त तथा आत्मा परमात्मा के दर्शन से दूर बौद्ध धर्म की ओर उनकी अभिरुचि पहले से ही थी। धर्म जैसी चीज को वे आँख बंद करके छोड़ना तथा अपनाना नहीं चाहते थे। हिन्दू धर्म की प्रचलित संकीर्णताओं से ऊब कर उसे त्यागने की घोषणा 1935 में की थी लेकिन 21 वर्षो तक उन्होंने विश्व के सभी प्रमुख धर्मो का गहन अध्ययन करने के बाद 1956 ई० में भारत में ही बौद्ध धर्म को नागपुर में पीने पाँच लाख से अधिक अनुयायियों के साथ अंगीकार किये। यह विश्व की द्वितीय घटना थी जब एक साथ और एक ही दिन इतनी भारी संख्या में लोगों ने धर्मान्तरण किया हो

महान समाज सुधारक –


       “डा० अम्बेडकर सच्चे देश भक्त थे और लोकतान्त्रिक प्रणाली से नई सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना उनका उद्देश्य था।“ प्रधानमंत्री स्व० पं० जवाहर लाल नेहरू भी कहते थे- “डा० अम्बेडकर को इस बात के किए सबसे अधिक याद किया जायेगा कि वह हिन्दू समाज की सभी दमनकारी बातो के विरुद्ध एक प्रतिक थे। उन्होंने सभो बातों के विरुद्ध विद्रोह किया जिनके विरुद्ध सबको विद्रोह करना चाहिए। बाबा साहेब के सतत संघर्षो और आंदोलनों के कारण महाड़ तालाब तथा कालाराम मंदिर, दोनों अछूतो के लिए भी खुल गए। बाबा साहेब ने 1935 में यवला में यह घोषणा किये कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश की बात नहीं थी, लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरूँगा नहीं, यह मेरे वश की बात है।“ बाबा साहेब डा० अम्बेडकर ने समाज सुधार के लिए स्वतंत्रता, समानता, न्याय, भ्रातृत्व और राष्ट्रिय एकता को आवश्यक तत्व माना। बाबा साहेब अम्बेडकर अपनी शिक्षा और योग्यता के बल पर ऊँचे से ऊँचे पदों पर बैठ सकते थे। अनेक पदों के लिए निमंत्रण भी मिले लेकिन उन्होंने ने उन्हें ठुकरा दिया और समाज सेवा में अपने को समर्पित किया।

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